मैं ही रक्षक हूं मेरा
खुद की ही रक्षा करनी हैं
जीवन एक ग्रंथ हो
ऐसी ही कोशिश करनी हैं
अहंकार रावण
मनोबल राम
मर्यादा सीता
और दृढ़
निष्ठा हनुमान
सब मुझ-ही में बसते हैं
चारों पहर कई बार
मेरे किरदार बदलते हैं
अब तो दर्पण में दिखते
हैं बहुत सारे प्रतिबिंब मुझे
भरत, सुग्रीव व लक्ष्मण
के मिलेजुले से लक्षण
दिखलाई पड़ते हैं
सोम को क्रूर कैकेयी बनु
और हर रविवार कुंभकरन हूं
विनम्र विश्वामित्र कभी
कभी बेबस दशरथ मैं
मन में मेरे पुण्य कथा
रामायण की निरंतर चलती हैं
मैं ही रक्षक हूं मेरा
खुद की ही रक्षा करनी हैं
